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Raj Bhasha

महादेवी वर्मा का विचार है कि

अंधकार से सूर्य नहीं दीपक जूझता है-

रात के इस सघन अंधेरे में जूझता सूर्य नहीं जूझता रहा दीपक!

कौन सी रश्मि कब हुई कम्पित कौन आँधी वहाँ पहुँच पायी

कौन ठहरा सका उसे पल भर कौन सी फूँक कब बुझा पायी।।

 

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति के मूल

बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को शूल 

 

प्रेमचन्द उर्दू का संस्कार लेकर हिन्दी में आए थे और हिन्दी के महान लेखक बने। हिन्दी को अपना खास मुहावरा ऑर खुलापन दिया। कहानी और उपन्यास दोनो में युगान्तरकारी परिवर्तन पैदा किए। उन्होने साहित्य में सामयिकता प्रबल आग्रह स्थापित किया। प्रेमचंद से पहले हिंदी साहित्य राजा-रानी के किस्सोंरहस्य-रोमांच में उलझा हुआ था। प्रेमचंद ने साहित्य को सच्चाई के धरातल पर उतारा।

 

द्विवेदी जी सरल और सुबोध भाषा लिखने के पक्षपाती थे। उन्होंने स्वयं सरल और प्रचलित भाषा को अपनाया। उनकी भाषा में न तो संस्कृत के तत्सम शब्दों की अधिकता है और न उर्दू-फारसी के अप्रचलित शब्दों की भरमार है वे गृह के स्थान पर घर और उच्च के स्थान पर ऊँचा लिखना अधिक पसंद करते थे। द्विवेदी जी ने अपनी भाषा में उर्दू और फारसी के शब्दों का निस्संकोच प्रयोग किया,किंतु इस प्रयोग में उन्होंने केवल प्रचलि

 

 

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